कनक्वे मिललू हम तें रोजगार ।
यू ही सवाल च मन मा बार बार ।
किलै नी होणा हम पहाड जाणक तैयार ।
जख ठंडू ठंडू बांझे की जेडियों कु पाणी
।
जख हरी भरी सार ।
छोडा ना तुम पहाड तें अभी भी समझी
जावादों ।
जब जाण आखिर पहाड च ये पहाड छोडिक ना आवा दों ।
समझा रोंत्याला पहाड की कीमत अफु तें
समझावा दों ।
ना छोडा
मेरा पहाड मेरा पहाड आवा दों ।
कैन बोली की हम दिल्ली देहरादूण बस्यां छन
।
हम तें पते च कनि नखरी आफत मां फंस्याछन ।


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